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Description
आखिर कौन सुनेगा इनकी
- राकेश गांधी -
शराब ने इन महिलाओं की जिन्दगी को नरक बना कर रख दिया है। पति के रहते न सुख से जी पाईं और न अब उनके जाने के बाद सुकून से जी पा रही हैं। हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। पहले काछबली, मण्डावर, बरजाल, थानेटा, बरार जैसी ग्राम पंचायतों में शराबबंदी को लेकर आंदोलन हुए, जिनमें से कुछ जगह शराब से छुटकारा मिला भी। अब कुकरखेड़ा में ये सुगबुगाहट होने लगी है।
इन क्षेत्रों में जाने पर महसूस हुआ कि वाकई इन महिलाओं की स्थिति दयनीय हो चुकी है। शराब की लत में फंसे कई महिलाओं के पति घर के ही 'चोर' बन चुके हैं। वे चोरी-चुपके घर के बर्तन-भाण्डे ही नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के छोटे-बड़े जेवरात तक बेच आते हैं। बच्चों के पढऩे के लिए फीस नहीं जुट पाती, पर उन्हें शराब के लिए पैसे चाहिए होते हैं। ऐसे में ये शराबी घर में ही चोरियां करने लगते हैं। पैसे नहीं मिलते तो अपनी जीवन संगिनी को अमानवीय यातनाएं देने पर उतारू हो जाते हैं। बच्चों को जानवरों की तरह पीटने में भी इन्हें दया नहीं आती। उनसे शराब मंगवाई जाती है। ऐसे हालात तो हमें किसी नरक से भी गई गुजरी दशा का नजारा देखने को विवश करते हैं। थानेटा ग्राम पंचायत में जब जाने का मौका मिला तो वहां के हाल ही अजीब थे। महिलाओं ने रोते हुए बताया था कि स्कूल से लौटे उनके मासूम बच्चों के मुंह से शराब की बदबू आती थी। जब वे महिलाएं पता करने निकलीं तो उन्हें हैरान कर देने वाली जानकारी मिली कि उनके बच्चों को स्कूल के पास बने ठेके से उनके घर के रास्ते के बीच सड़क पर पड़े शराब की बोतलों के ढक्कन चाटने की लत लग चुकी है। महिलाएं ये बताते हुए रोने लगीं थी। ये दु:ख तो उन्हें रोज मिलने वाली यातनाओं से कुई गुना ज्यादा था। ये हालात केवल थानेटा के ही नहीं है, विभिन्न क्षेत्रों के मासूम व युवा धीरे-धीरे शराब की लत के शिकार होते जा रहे हैं और सरकार शराब बेचकर राजस्व जुटाने में लगी है। सबसे ज्यादा दिक्कत तो इन शराब ठेकों से जुड़ी अवैध शाखाओं को लेकर भी है, जो कई छोटे-बड़े गांवों में फैली है।
ऐसा बताया जा रहा है कि लॉकडाउन में जब लोगों के पास खाने को पैसे नहीं थे, इस प्रदेश सरकार ने शराब बेचकर कई हजार करोड़ का राजस्व जुटा लिया। कई बार तो लगता है सरकार ने गरीबों को जो दो-ढाई हजार रुपए राहत के लिए दिए थे, वे चुपके से शराब के जरिए वापस निकलवा लिए। यदि ऐसा नहीं था तो लॉकडाउन में शराब के ठेके खोलने की अनुमति देने की जरूरत ही क्या थी।
खैर, फिलहाल भीम कस्बे में आने वाली विभिन्न ग्राम पंचायतों की महिलाओं की पुकार सुनने की जरूरत है। जिला प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों व सरकार तक वहां जाकर उनकी दशा को देखने की जरूरत है। उनके घर के हालात देखने की जरूरत है। उनके बच्चों की शिक्षा व पालन-पोषण की सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत है। केवल भीम ही नहीं, यदि सरकार का ध्यान यदि शराब बेचकर राजस्व जुटाने पर ही रहा, तो प्रदेश में ऐसी कई ग्राम पंचायतों की महिलाएं सड़कों पर होगी, जो शराब से अपने घर को तबाह होते नहीं देखना चाहती। ऐसे में तत्काल सुधारवादी कदम उठाने की जरूरत है।
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