आग लगे बस्ती में, मुक्तराम मस्ती में || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2023)
प्रसंग:
अष्टावक्र गीता - 9.3
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् ।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥
अर्थ:
तीनों तरह के तापों से ग्रस्त है ये जगत, अनित्य है, असार है, हीन है, त्याज्य है।
ऐसा निश्चय करके ज्ञानी शांति को प्राप्त होता है।
माया छोड़न सब कहे, माया छोड़ी न जाय।
छोड़न की जो बात करूँ, बहुत तमाचा खाय ॥
संत कबीर
~ ऋषि किसे त्यागने के लिए कह रहे हैं?
~ जगत बंधन है या मुक्ति का अवसर, यह किस पर निर्भर करता है?
~ संसार के साधनों का सार्थक उपयोग क्या है?
~ सुख किसे कहते हैं?
~ जगत क्या है?
~ क्यों कोई वस्तु हीन या श्रेष्ठ नहीं होती? वस्तुओं से हमारा रिश्ता कैसा होना चाहिए?
संगीत: मिलिंद दाते
~~~~~
Related videos
आग लगे बस्ती में, मुक्तराम मस्ती में || आचार्य...
आचार्य प्रशान्त
लगे है, तब है ; जब लगे नहीं है, तब भी है || आचा...
आचार्य प्रशान्त
दाल में नमक कम, आँख में मिर्च ज़्यादा — फिर कुछ...
आचार्य प्रशान्त
आत्मा न शरीर छोड़ती है, न शरीर में प्रवेश करती...
आचार्य प्रशान्त
मुक्त पुरुष और अहंकारी में भेद || आचार्य प्रशां...
आचार्य प्रशान्त
अध्यात्म में त्याग ज़रूरी क्यों? || आचार्य प्रश...
आचार्य प्रशान्त
आत्मा न शरीर छोड़ती है, न शरीर में प्रवेश करती...
आचार्य प्रशान्त
अच्छा-बुरा छोड़ो, गहराई में देखना सीखो! || आचार...
आचार्य प्रशान्त
आत्मा न तो शरीर में रहती है, न शरीर का आत्मा से...
आचार्य प्रशान्त
मन बंधन में कब है? || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र...
आचार्य प्रशान्त
आत्मा न तो शरीर में रहती है, न शरीर का आत्मा से...
आचार्य प्रशान्त
आत्मा न तो शरीर में रहती है, न शरीर का आत्मा से...
आचार्य प्रशान्त